बिहार इलेक्शन वाच व एडीआर का वेबीनार, मनमाने तरीके से प्रत्याशियों के चयन से आ रही है गवर्नेंस में गिरावट - BiharDailyNow
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बिहार इलेक्शन वाच व एडीआर का वेबीनार, मनमाने तरीके से प्रत्याशियों के चयन से आ रही है गवर्नेंस में गिरावट

पटना: बिहार इलेक्शन वाच एवं एडीआर के संयुक्त तत्वावधान में बुधवार को राजनीतिक दलों के लोकतंत्र में आरटीआई का उपयोग और पार्टी फंडिग में पारदर्शिता बिषयक बेविनार का आयोजन संपन्न हुआ।

संगोष्ठी के पहले वक्ता मेजर जनरल अनिल वर्मा ( अवकाश प्राप्त) ने एडीआर के यात्रा पर बात करते हुए कहा कि पारदर्शिता को लेकर केंद्रीय सूचना आयोग ने क्रांतिकारी फैसला सुनाया था जिससे राजनीति एवं चुनाव सुधार की दिशा में मील का पत्थर माना गया था, किन्तु राजनीतिक दलों ने इसे स्वीकार नहीं किया। नतीजा यह है कि किसी भी पार्टी को रेगूलेट करने की व्यवस्था नहीं है। पैसे कहां से आते हैं और कहां खर्च होते हैं यह पता नहीं लगाया जा सकता है। संविधान ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तो दिया है, जिसे कोई छीन नहीं सकता। यह सभी पर लागू होता है। सबको जानने का अधिकार भी है। मनमाने तरीके से प्रत्याशियों का चयन हो रहा है जिससे गवर्नेस मे गिरावट आ रही है। हजारों करोड़ रुपए आ रहे हैं। विधिवत् जानकारी नहीं दी जाती है। अधूरी जानकारी होती है।

उन्होंने कहा कि इलेक्टोरल बाण्ड से पारदर्शिता और जबाबदेही कम हुई है, जबकि इसे पारदर्शिता के नाम पर लाया गया था। पिछले डेढ़ सालों में छह करोड़ से अधिक पैसे इलेक्टोरल बाण्ड से ही मिले हैं। जो पार्टी सत्ता में रहेगी तो उसे ज्यादा चंदा मिलेगा। इलेक्टोरल बाण्ड भी आरटीआई के दायरे से बाहर है। बडी कंपनियां पैसे दे रही हैं, यह आप पता नहीं लगा सकते। बड़े-बड़े कारपोरेट घराने हैं, जो चंदा देते हैं और उसके बदले फायदा लेते हैं।  आयोग अथवा आयकर विभाग यह बोल कर बचता रहा है कि यह मेरा काम नहीं है। जहां कि गरीबी और भूख से लोगों की जिंदगी बदहाल हो वहां हजारों करोड़ चुनाव में खर्च हो रहे हैं, यह बड़ी विडंबनापूर्ण स्थिति है। पैसे वालों की जीतने की संभावना अधिक रहती है। राजनीति में सफाई से भ्रष्टाचार कम होगा। क्रोनी कैप्टलिज्म घटेगा। अभिवंचित समुदायों की भागीदारी बढेगी। आरटीआई के दायरे में लाने के बाद एक-एक पैसे का हिसाब देना होगा। 20 हजार की सीमा को बदलने की जरूरत है। आयोग को दण्डित करने का अधिकार हो। पार्टी के निबंधन को रद्द करने का भी अधिकार होना चाहिए।

आंतरिक लोकतंत्र एवं वित्तीय पारदर्शिता के सवाल पर ब्रजकिशोर स्मारक प्रतिष्ठान के अध्यक्ष प्रेम कुमार वर्मा ने कहा कि कि आरटीआई काफी संघर्ष के बाद मिला था जिसे राजनीतिज्ञों ने भोथरा कर दिया है। अधिकतर पार्टियों में वित्तीय पारदर्शिता और आंतरिक लोकतंत्र समाप्त हो गया है और पार्टियों को लोकतांत्रिक अवधारणाओं के अनुसार चलाया नहीं जा रहा है जिसके कारण सरकारें भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनुसार नहीं चल पा रही है।

वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर ने कहा कि मीडिया अपनी भूमिका निभा नहीं पा रही है। बहुत ही उत्साह के साथ आरटीआई आया था लेकिन आज दयनीय स्थिति में है। चुनाव सुधार एवं आरटीआई मीडिया की प्रासंगिकता मे कभी रहा हीं नहीं। मीडिया राजनीतिज्ञों के इर्द गिर्द घूमती रहती है। सरकारें सूचना छिपाने के तिकडम में लगी रहती है। अब जनता में ही जागृति लाने की जरूरत है। अब चुनाव सुधार को मुद्दा बनाकर आंदोलन की जरूरत है। चुनाव सुधार नहीं तो चुनाव नहीं पर अभियान चलाने की जरूरत है। अन्त में प्रतिभागियों के सवालों के जबाव वक्ता ने दिए। बिहार के सुदूरवर्ती इलाकों के संगोष्ठी में भाग लिया। संचालन एवं स्वागत राजीव कुमार ने किया।

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