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परिवारवाद से जातिवाद तक का सफर

परिवारवाद और जातिवाद की राजनीति तो बिहार शुरू से करता आ रहा है। शायद यही वजह है कि बिहार विकास के क्षेत्र में अन्य राज्यों से पिछड़ गया है। बिहार में विधानसभा चुनाव का पहले फेज का मतदान 28 अक्टूबर 2020 को है। 71 विधानसभा सीटों के लिए पहले फेज का चुनाव होना है। ऐसे मेें हम आपकोे बताएंगेे बिहार के कुछ ऐसे विधानसभा केे बारे में जो परिवावाद का जीता-जागता उदाहरण है। गया जिले के दस में से छह विधनसभा सीटें ऐसी हैं, जिनमें एक व्यक्ति या एक ही परिवार का कब्जा पिछले 20-30 वर्षोँ से है। राजनीतिक पार्टी न ही किसी अपने जीताने उम्मीदवार ​को हटाती है और न ही किसी दूसरे उम्मीदवार को अब तक इन विधानसभा में चुनाव लड़ने मौका मिला है। चलिए जानते है कौन है, वो उम्मीदवार जो –

1. प्रेम कुमार चौधरी – गया टाउन से प्रेम कुमाार 30 साल से विधायक है। एक ऐसे नेता जो लगातार 7 बार से जीतते आ रहें है। 1990 से भाजपा की ओेर से पहली बार इन्हे टिकट मिला था। यह गया टाउन से खड़े हैं। इस बार भी भाजपा ने इन्हे यहीं से टिकट दिया है।

2. सुरेंद्र यादव – बेलागंज विधानसभा क्षेत्र से सुरेेंद्र यादव को सात साल से टिकट मिल रहा है और यह अपने नाम पर जीत दर्ज करते आ रहे है। 1990 में पहली बार इन्हेें जीत मिली थी। 1998-2000 की अवधि को छोड़कर वे लगातार विधायक रहे हैं। राजद ने इस बार भी इन्हे बेलागंज से टिकट दिया है।

3. उदय नारायण चौधरी – उदय नारायण चौधरी इमामगंज विधानसभा सेे लगातार पांच बार से जीत अपने नाम दर्ज करवाते आ रहे है। पहली बार 1990 में इमामगंज विधानसभा से जीते थे। इस बार राजद ने इन्हें यहीं से अपना उम्मीदवार घोषित किया है।

4. राजेंंद्र यादव – अतरी विधानसभा क्षेत्र जहां से 5 बार से राजेंद्र यादव का परिवार जीतता रहा है। कभी राजेेंद्र यादव, कभी उनकी पत्नी कुंती देवी और इस बार राजेंद्र यादव के बेटे अजय यादव को राजद ने अतरी विधानसभा से टिकट दिया है।

5. अवधेश सिंह – वजीरगंज विधानसभा जो अवधेश सिंह का गढ़ माना जाता है। कुल मिला कर वह 20 साल तक विधायक रहे। 2015 में वह इसी विधानसभा से जीते थे। इस साल अवधेश सिंह के बेेटे डॉ शशि शेखर को कांग्रेस पार्टी ने वजीरगंज से टिकट दिया है।

यह हैं बिहार के कुछ ऐसे नेता जो लगातार कई सालोें से एक ही विधानसभा क्षेत्र से जीतते आ रहे है और राजनीतिक पार्टियां इन सीटो पर कोई रिक्स भी नहीं लेना चाहती। अब देखना यह है कि क्या यह उम्मीदवार इस बार अपनी सीट बचा पाते हैं या नहीं।

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