तो क्या रामविलास पासवान के नहीं रहने से बदल सकती है विधानसभा चुनाव की तस्वीर! - BiharDailyNow
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तो क्या रामविलास पासवान के नहीं रहने से बदल सकती है विधानसभा चुनाव की तस्वीर!

पटना: देश की दलित राजनीति के सबसे बडे चेहरे रामविलास पासवान के निधन से क्या बिहार विधानसभा की तस्वीर और लोजपा की छवि बदल सकती है? शायद यह कहना अभी जल्दबाजी होगी क्योंकि इसका पता तो बिहार विधानसभा चुनाव में लोजपा को मिली सीटों के बाद ही चल सकेगा लेकिन इतना तो तय है कि पासवान के नहीं रहने से दलित राजनीति व वोटरों पर असर पड सकता है।

पांच जिलों में है दलित वोट बडे फैक्टर
दरअसल बिहार के पांच जिले समस्तीपुर, खगड़िया, जमुई, वैशाली और नालंदा में दलित वोटरों का एक बडा वर्ग है जो चुनाव में एक बडे फैक्टर के रूप में अपनी अहमियत को दर्शाते रहे हैं। सबसे अहम यह कि इन जिलों में रामविलास पासवान का अच्छा खासा असर रहा है। अब जबकि रामविलास पासवान का निधन हो चुका है और चिराग के कंधों पर अहम जिम्मेवारी है ऐसे में बहुत ज्यादा संभव है कि इन जिलों में आने वाले बिहार विधानसभा चुनाव में लोक जनशक्ति पार्टी को लाभ मिल सकता है। बता दें कि सूबे की आरक्षित सीटों में हाजीपुर, समस्तीपुर, जमुई, गोपालगंज, सासाराम और गया हैं।

अच्छा खासा है महादलित, दलित मतदाताओं का हिस्सा
जातीय समीकरण में अलग पहचान रखने वाले राज्य बिहार में करीब 16 फीसदी ऐसे वोटर हैं जो महादलित व दलित तबके से ताल्लुक रखते हैं। बता दें कि 2005 के विधानसभा चुनाव में पासवान ने लोजपा का साथ नहीं दिया था तब बडा दांव चलते हुए नीतीश कुमार ने 22 में से 21 जातियों को दलित से महादलित घोषित कर दिया था। इसका एक कारण नीतीश कुमार का दलित वोटरों में सेंधमारी करने का भी था। तब केवल पासवान जाति को ही इस श्रेणी में स्थान नहीं मिला था। इस बडी सेंधमारी के कारण पासवान जाति के मतदाताओं की संख्या करीब साढे चार प्रतिशत रह गयी थी वहीं महादलितों की संख्या करीब दस प्रतिशत हो गयी थी। नीतीश के इस अहम कदम का असर भी देखने को मिला जब 2009 में पासवान चुनाव हार गये लेकिन वक्त ने पलटी मारी और 2014 में पासवान ने एनडीए में इंट्री मारी और एनडीए में शामलि नीतीश कुमार की राह अलग हो गयी।

चिराग के कंधों पर अहम जिम्मेवारी
यह पहला मौका होगा जब चुनाव में रामविलास पासवान नहीं रहेंगे। ऐसे में वर्तमान लोजपा सुप्रीमो सह जमुई सांसद चिराग पासवान का नहीं होना लोजपा के साथ राज्य के लोगों पर पड सकता है। रामविलास पासवान के साथ एक और अहम बात यह रही कि उन्होंने पहचान भले ही दलित नेता के तौर पर बनायी हो लेकिन सवर्ण तबकों में उनकी छवि नकारात्मक नहीं रही है। ऐसे में उनकी इस छवि का लाभ भी चिराग पासवान को मिल सकता है।

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